हर इक युग में यही सुकरात का अंजाम होता है...
गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से यह गज़ल कहने लायक हो पाई है। पिछले दिनों गुरूजी ने एक आक्रोश भरा पोस्ट लिखा था और बताया था कि वे मंदिर क्यों नहीं जाते । उनको समर्पित एक शेर भी शामिल है इस गज़ल में। तो पढ़िये और आशीर्वाद दीजिये- सुना है के मुहब...
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रविकांत पाण्डेय
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[25 May 2009 06:12 AM]



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