लखनऊ से गुज़रे हैं लोग तो बहुत से मगर...
श्रद्धेय पंकज 'सुबीर' जी द्वारा आयोजित तरही मुशायरे हेतु यह ग़ज़ल नुमा रचना लिखी थी, आप भी पढिये. मिसरा था, "कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी". रहगुज़र की खामोशी हमसफ़र की खामोशी कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी, हिंदी और उर्दू में सिर्फ़...
[पूरी पोस्ट]
अभिनव
21
4
0
4
5
[23 May 2009 13:57 PM]



Shuffle








