किताबें शिनाख्त नहीं बनती....
आज की कविता अमृता प्रीतम के आखिरी दिनों में लिखी गयी कविता में से हैं ...अमृता अपने सपनों पर बहुत विश्वास करती थी ,और उनके अर्थो में ज़िन्दगी के मायने तलाश लेती थी .. अपने देखे कई सपनों को उन्होंने नज्मों और कहानी में ढाल लिया ...हर सपना जैसे ज़िन्दग...
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रंजना [रंजू भाटिया]
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[22 May 2009 07:07 AM]



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