निर्जीव परम्परा

क्षितिज निर्जीव परम्परा उस दिन एक पूरा का पूरा आसमान, मेरे सिर पर टूट प़डा था। आसमान जो चाँद सितारों से जड़ा था। तब मैंने जाना, कि उस आकाश में चाँद सितारे ही नहीं, कील कांटे भी थे। और उस मलबे के नीचे मैं असहाय बेबस, तुम्हें पुकारती रही। किन्तु तुम अपने अस्ति... [पूरी पोस्ट]
writer उषा वर्मा
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[21 May 2009 13:28 PM]

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