बाढि पर एक कवि- डॉ. गंगेश गुंजन
दु:खे टा चारु कात छै आ जी रहल- ए लोक ताकैत आसरा कोनो दुःख पी रहल- ए लोक ! घर-द्वारि दहि गेलैक सब बच्चा टा छै बांचल रेलवेक कात, बाट-घाट जी रहल- ए लोक ! सांझो भरिक खोराक ने छैक अगिला फसलि धरि जीबा लए ई लाचार कोना जी रहल- ए लोक ! कवि- डॉ. गंगेश गुंजन, 7...
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सम्पादक: कतेक रास बात
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[21 May 2009 12:03 PM]



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