अज्ञात
यादों की नागफनी सी चुभती रात, होंठों पर पथराती अंतस की बात। सब कुछ विष बोरा सा , सब कुछ बदरंग, ख़त्म नहीं होता है , दर्द का प्रसंग। ( यह रचना भी बुद्धिनाथ मिश्र की है, जो याद रहती है.)...
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वन्दना अवस्थी दुबे
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[21 May 2009 08:15 AM]



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