फरीद के श्लोक - ३३
फरीदा हउ बलिहारी तिन पंखिआ जंगल जिंना वासु॥ककरु चुगनि थलि वसनि रब न छोडनि पासु॥१०१॥फरीदा रुति फिरी वणु कंबिआ पत झड़े झड़ि पारि॥चारे कुंडा ढूंढीआं रहणु किथाउ नारि॥१०२॥फरीदा पाड़ि पटोला धज करी कंबलड़ी परिरेउ॥जिनी वेसी सरु मिलै सेई वेस करेउ॥१०३॥फरीद जी कहते...
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परमजीत बाली
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[21 May 2009 03:45 AM]



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