गीत ग़ज़ल औ गीतिका
हम बंजारे नगरी नगरी अपना कहाँ ठिकाना है सुबह जलाए चूल्हा-चाकी शाम हुए उठ जाना है दो दिन बाद पकी हैं रोटी ,धुँआ लग गई कोठी में महलों वाले सोच रहे हैं ,झुग्गी वाले हेन्ठी में सुबह-शाम की भाग-दौड़ में जो कुछ हासिल हो पाया लाद चले हैं खटिया-मचिया छोड़ यही...
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आनन्द पाठक
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[20 May 2009 12:00 PM]



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