एक चौकन्नी चिडिया की तरह मन आसन्न खतरे को भांप लेता है ओर एक खीज भरे रास्ते से गुजर जाता है... क्या मांगू उससे वो सब कुछ दे सकता है.

ताना-बाना वो जितना आगे बढ़ी थी ,उतना ही पीछे लौटना था ..उस मुकाम से जहाँ वो थी आदेश पहले था और नियति बाद मैं ..गिने चुने क़दमों के साथ बिल्कुल आगे देखते हुए ..लौटना पीछे की ओर नियत दूरी को पैरों से साधते हुए .बचपन मैं ये खेल भाई-बहन दोस्तों के साथ खेलते हुए वो... [पूरी पोस्ट]
writer Vidhu
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[20 May 2009 09:59 AM]

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