" कहानी रौशनी की कभी ख़त्म नहीं होती, अँधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो "
कितने किस्से हैं ...कितनी ऐसी बातें जो पिछले दिनों रह रह कर उद्वेलित करती रही ...मनोभावों को किसी टूटे कांच की किरच की तरह कुरेदती रही....खुरचती रही पर कभी अपनी तो कभी नेटवर्क की खराब सेहत के चलते लिख नहीं पाया ...समग्रता से समेट नहीं सका ! कोई वक़्त...
[पूरी पोस्ट]
विक्षुब्ध सागर
27
1
0
1
0
[19 May 2009 16:57 PM]



Shuffle








