विरोध का यह तरीका, न जाने क्यों परिभाषित न हो सका

युं ही, निट्ठल्ला... शहीद की अगली कड़ी देनी है । साथ ही अपना भी कुछ लिखने का मन बन रहा है, पर विरोध या अंतर्विरोध का कोई स्वर निकल ही नहीं पा रहा । क्या करें ?  सा रे गा से  उठाने पर  मा पर जाकर टिक जा रहा है ! यहीं से एक मुरकी लगाकर मा पर ही बिलँबित होना ठ... [पूरी पोस्ट]
writer डा. अमर कुमार
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[19 May 2009 16:45 PM]

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