एक गीत :नफ़रत नफ़रत से बढ़े...

गीत  ग़ज़ल  औ गीतिका नफ़रत नफ़रत से बढ़े प्यार से प्यार बढ़े अपनी बांहों में ज़माने को समेटो तो सही लोग सहमे हैं खड़े खिड़कियाँ बंद किए आँखे दहशत से भरी होंठ ताले हैं पड़े उनके दर पे भी कभी प्यार से दस्तक देना जिनकी खुशियाँ हैं बिकी सपने गिरवी हैं रखे कौन कहता है कि पत्थर तो प... [पूरी पोस्ट]
writer आनन्द पाठक
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[19 May 2009 10:34 AM]

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