एक कविता " मृदुल अंकुर भी ...

गीत  ग़ज़ल  औ गीतिका मृदुल अंकुर भी तोड़ कर पत्थर पनपती है एक उर्जा-शक्ति अंतस में धधकती है 'मगर हम आदमी है उम्र भर लड़ते रहे नित्य-प्रति की शून्य अभावों से रोज़ सूली पर चढ़े - उतरे आँख में आंसू भरे और तुम? देवता बन कर बसे जा पहाडों में ,गुफाओं में कन्दराओं में ! या नदी के... [पूरी पोस्ट]
writer आनन्द पाठक
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[19 May 2009 03:30 AM]

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