हम किताबें ही नहीं, दिल भी पढ़ा करते हैं.
ग़ज़ल हम किताबें ही नहीं, दिल भी पढ़ा करते हैं. दस्तख़त वक्त के सीने पे जड़ा करते हैं. आँखें बरसे हैं तो थोड़ा ये सुकूँ मिलता है, दिल के सीमेन्ट को इस तरह कड़ा करते हैं. सीढ़ियाँ फ्लेट की चढ़ने में उखड़ती सांसें, लिफ्ट से लोग तो हँस-हँस के चढ़ा करते...
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डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[19 May 2009 02:17 AM]



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