कुछ मुक्तक
कुछ मुक्तक पारदर्शी तेरा आवरण कर न पाया तुझे संवरण मैंने दर्शन बहुत कुछ पढ़ा पढ़ न पाया तेरा व्याकरण -- ० -- भावना का स्वरुपण हुआ अर्चना का निमंत्रण हुआ फूल क्या मैं धरूँ देवता ! ----०----- आज अपना हूँ मैं संस्मरण तुम भले ही कहो विस्मरण आज स्वीकार कर ल...
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आनन्द पाठक
मुक्तक
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[18 May 2009 10:48 AM]



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