कोई तो बात है......
जानवर *~*~*~*~*~*~* गमों की जमीन पर कोई “खुशी" का मचान नहीं है, क्या हुं? कौन हुं मैं? मुझे अपनी पहचान नहीं है, काश!!! उड़ पाता कहीं ऊँचे अपने यह पँख फ़ैला कर, अफ़सोस!!! मेरे मुकद्दर में कहीं आसमां नहीं है, भीड़ में रह कर भी रहा हुँ सदा तन्हा मैं, मेरे ल...
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गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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[18 May 2009 05:46 AM]



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