एक और जन्मदिवस

निनाद गाथा एक और जन्मदिवस आ गया है द्वार पर,   सूर्य की परिक्रमाएं तीस कर चुका है तन, व्योम में भटक भटक के लक्ष्य ढूंढता है मन, ज़िम्मेदारियों की झील धीरे धीरे भर गई, केशराशि कुछ जगह और खाली कर गई, लो अधेड़ उम्र की तरफ चली नई नदी, लग रहा है मानो कुछ बुढा गई... [पूरी पोस्ट]
writer अभिनव
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[17 May 2009 13:23 PM]

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