उसी ढलान पर चढी थी मैं ............
उसी ढलान पर चढी थी मैं ...... प्रिय तुम्हे पाने की खातिर तनती रही , समतल सनी शीशे की सी बिछी रही और तुम थे उस ऊंचाई पर चांदनी की चाह ओढे झक रजत चन्द्रिका की शुभ्र प्रभा की रश्मियों से घिरे था यही विधि का नियम न पहुँचना था मुझे , न पहुँची मैं बस चलती...
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swati
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[17 May 2009 13:20 PM]



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