एक ग़ज़ल : मोहन के बांसुरी की जैसे तान....

गीत  ग़ज़ल  औ गीतिका मोहन के बांसुरी की जैसे तान है ग़ज़ल कोयल की कूक मीठी जैसी गान है ग़ज़ल जैसे कि मां की गोद में सोया हुआ बच्चा चेहरे पर हौले-हौले मुस्कान है ग़ज़ल खिलते हुए कमल पे ठहरी हुई शबनम छूने को मचलती हुई अरमान है ग़ज़ल मिलते कभी सफर में जैसे दो अजनबी परदेश मे... [पूरी पोस्ट]
writer आनन्द पाठक
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[17 May 2009 04:09 AM]

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