एक समर्पण गीत ....
एक समर्पण गीत .... चेतना हो जहाँ शून्य उस मोड़ पर वेदना हो जहाँ मूक उस छोर पर हँस उठे प्राण-मन खिल उठे रोम तन गूँज भर दो मेरी बांसुरी में .... भावना के सिमटने लगे दायरे टूटने जब लगे प्रीत के आसरे मैं पुकारूं तुझे श्वांस बन कर मिलो जिन्दगी की सफ़र आख़ि...
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आनन्द पाठक
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[16 May 2009 10:22 AM]



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