पुरानी प्रेमिका
अक्सर देखा है मैंने , पेड़ से पत्तों को अलग होते हुए , हर साल पतझड़ में । हर बार वो टूटते हैं , फिर नए पत्ते जुड़ते हैं , यह सिलसिला हर साल , दुहराया जाता है । पर उन पत्तों का क्या ? जो टूट कर बिखर जाते हैं , जैसे वास्ता ही नहीं रहा हो , कभी एक दूसरे...
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Navnit Nirav
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[16 May 2009 09:12 AM]



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