मरते हैं जी जाने में

जोशी कविराय  - Joshi Kavirai पैसे चार कमाने में । मरते हैं जी जाने में ॥ कितना ऊँचा काम कर गए । इस चालाक ज़माने में ॥ हमने सारी उमर बिता दी उनका दिल बहलाने में ॥ फिर भी जगह मिली चौखट पर उनके दौलतखाने में ॥ बैठक में मीठी लफ़्फ़ाजी सत्य कहीं तहखाने में ॥ भीड़-भाड़ में क्या बतलाएँ कभ... [पूरी पोस्ट]
writer joshi kavirai
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[15 May 2009 08:14 AM]

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