दर्द के मुकम्मल तराने पे...
दर्द के मुकम्मल तराने पे ना गिरे आँसू उनके मेरे अफ़साने पे ना गिरे सजदे में ज़माना है मगर, मेरी जिद- कि सर मेरा उनके बुतखाने पे न गिरे जिक्र उनकी बुलंदी के होते हैं अक्सर शख्स, जो लाख आजमाने पे न गिरे कमी उनकी ठोकर में नहीं थी मगर हम थे, जो लड़खडाने प...
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क्षितीश
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[15 May 2009 01:12 AM]



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