एक प्यादे से मात पलटेगी
हर नई रुत के साथ पलटेगी ख़ुश्बू-ए-क़ायनात पलटेगी ये सियासत है इस सियासत में एक प्यादे से मात पलटेगी किसकी बातों का क्या यकीन करें पीठ पलटेगी बात पलटेगी रंग परछाई तक का बदलेगा सुब्ह होगी तो रात पलटेगी तुम संभल कर बस अपनी चाल चलो इक न इक दिन बिसात पलटे...
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चिराग जैन CHIRAG JAIN
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[14 May 2009 22:54 PM]



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