मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी भी क्या खूब है ,न जाने कितनों को रुलाती व हसांती है .जीवन संघर्ष में कभी -कदा हर किसी का पाला कभी ना कभी इस कचहरी से जरूर ही पड़ता है .मेरा भी पिछले १० सालों से एक मुकदमें के चक्कर में कचहरी आना -जाना लगा हुआ है .इस आने -जाने नें मुझमें एक नया...
[पूरी पोस्ट]
डॉ. मनोज मिश्र
42
4
0
4
20
[14 May 2009 10:18 AM]



Shuffle








