मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना

मा पलायनम ! कचहरी भी क्या खूब है ,न जाने कितनों को रुलाती व हसांती है .जीवन संघर्ष में कभी -कदा हर किसी का पाला कभी ना कभी इस कचहरी से जरूर ही पड़ता है .मेरा भी पिछले १० सालों से एक मुकदमें के चक्कर में कचहरी आना -जाना लगा हुआ है .इस आने -जाने नें मुझमें एक नया... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. मनोज मिश्र
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[14 May 2009 10:18 AM]

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