रक्स

Nitin Jalan चलाचल हूँ मैं एक अंधेर नगरी को ढुँढता हूँ रौशनी दम घुटता है कुछ अच्छा नहीं लगता पर चलना है , गुजरना क्या था क्या हो गया ख़त्म करना है मझधार में क्यों अटका न इधर का न उधर का रुक गयी है हवा और बस है इंतज़ार चलाचल हूँ मैं मिलती हैं कहीं एक किरण पकड़ने क... [पूरी पोस्ट]
writer mequitnever
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[14 May 2009 03:16 AM]

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