रक्स
चलाचल हूँ मैं
एक अंधेर नगरी को
ढुँढता हूँ रौशनी
दम घुटता है
कुछ अच्छा नहीं लगता
पर चलना है , गुजरना
क्या था क्या हो गया
ख़त्म करना है
मझधार में क्यों अटका
न इधर का न उधर का
रुक गयी है हवा
और बस है इंतज़ार
चलाचल हूँ मैं
मिलती हैं कहीं एक किरण
पकड़ने क...
[पूरी पोस्ट]
mequitnever
19
0
0
0
1
[14 May 2009 03:16 AM]



Shuffle







