राजेश उत्साही की दो और ग़ज़लें
।।एक।। कशमकश से जिन्दगी की न डर जाएं जो मन को भली लगे वही डगर जाएं गुजरना उम्र का है, बहना नदी का डरना है क्या, बस धार में उतर जाएं शूलों की चुभन हो, या फूलों की नाजुकी अपना तो काम है कि नई सहर लाएं तूफान में घिर गया है जिनका सफीना कुछ पल कश्ती पे...
[पूरी पोस्ट]
राजेश उत्साही
18
1
0
1
2
[13 May 2009 09:40 AM]



Shuffle








