ये सोचना की मैं.......
जानवर*~*~*~*~*~*~*~*~*~* कहीं चांद रातों में खो गया, कहीं चांदनी भी भटक गई, मैं चराग, वो भी बुझा हुआ, मेरी रात कैसे चमक गई? मेरी दास्तान को आरजु थी, तेरी नरम पलकों की छांव में, मेरे साथ था तुझे जागना, तेरी आँख कैसे झपक गई? भला हम मिले भी तो क्या मिले...
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गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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[13 May 2009 09:04 AM]



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