रोज चूल्हे की तरह
मैं हर रोज एक हसरत को दफ़न करता हूँ। रोज आँखें क्यूँ ? नया ख्वाब सजा लेती हैं॥ रोज गिरती है दर-ओ-दीवार जिन मकानों की। उम्मीदें फ़िर से वो ही घर क्यूँ? बना देती है॥ रोज चूल्हे की तरह जलते हैं दिल में अरमां। दिल क्यूँ? फ़िर उसी बस्ती को बसा देता है॥ यहाँ...
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निर्झर'नीर
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[13 May 2009 06:10 AM]



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