कैसे भी हो.....
जानवर~*~*~*~*~* बहारों में पतझड़ के साये है, नजारों पर अन्धेरे से छाये है, फुलों के दामन में कांटे है, बागों में फैले सन्नाटे है, कोयल की कूक अनजानी है, हंसी की आँखों में पानी है, खुशनुमा झोंकों में महक नहीं, आसमां में पंछियों की चहक नहीं, ख्यालों की...
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गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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[12 May 2009 08:44 AM]



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