आजकल

असुविधा आजकल कहाँ कर पाता हूँ कुछ भी ठीक से जुलूस में होता हूँ तो किसी पुराने दोस्त सी पीठ पर धौल जमा निकल जाती है कविता कविता लिखते समय किसी झगडालू पडोसी सी चीखती हैं अख़बार की कतरने डूबता हूँ अख़बार में तो किसी मुंहलगी बहन सी छेडने लगती है कहानी कहानियों के... [पूरी पोस्ट]
writer अशोक कुमार पाण्डेय
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[12 May 2009 05:27 AM]

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