हँसो-
हँसो- कि शायद, तुम्हारी हँसी सुने बगैर गुंचे खिलें ही नहीं! हँसो- कि शायद, तुम्हारी हँसी सुनकर धनक फूटते हों कहीं! हँसो- कि तुम्हें हक़ है हँसने का - मुझ पर भी! मेरी तो आदत है- कोई हँसे, तो लगता है- कहीं मुझ पर तो नहीं! हँसो- हो सके तो मेरे आँसुओं पर...
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क्षितीश
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[11 May 2009 21:52 PM]



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