पहला दलित, जो सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा
जाति-जाति रटते, जिन की पूँजी केवल पाखंड मैं क्या जानूँ जाति ? जाति है ये मेरे भुज दंड। ऊपर सिर पर कनकछत्र्, भीतर काले के काले, शरमाते नहीं जगत् में जाति पूछने वाले ? मगर मनुज क्या करे, जन्म लेना तो उसके हाथ नहीं, चुनना जाति और कुल, अपने बस की तो बात...
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सचिन ..........
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[11 May 2009 03:17 AM]



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