इनडिफाईनेबेल उर्फ़ अपरिभाषित उर्फ़ " मिस्कास्टिंग" का एक ओर दिन
जिंदगी कोई "हिचकॉक" की फिल्म नहीं है जहाँ संस्पेंस मुख्य पात्र है ..न ही मनमोहन देसाई का "खोया -पाया" फार्मूला ..इसका अधिकतर फुटेज स्टीरियो टाइप ही है ...कलात्मक सिनेमा संस्करण की बची खुची उम्मीद शर्मा जैसे "मिसकास्ट" लोग सुबह सुबह तोड़ते है ....भंगन...
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डॉ .अनुराग
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[11 May 2009 02:56 AM]



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