मरूं तो समय के सबसे उन्नत विचारों के साथ

एक हिंदुस्तानी की डायरी एक अभिन्न मित्र से बात हो रही थी। कहने लगे कि इधर दुनिया भर के पचड़े, कामकाज का झंझट, असुरक्षा और रिश्तों के तनाव ने इतनी खींचोंखींच मचा रखी है कि मन करता है सो जाओ तो सोते ही रहो। अतल नींद की गहराइयों में इतना डूब जाओ कि कुछ होश न रहे। एक सुदीर्घ नी... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल रघुराज
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[10 May 2009 20:59 PM]

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