अन्दर-बाहर

जोशी कविराय  - Joshi Kavirai जैसे दिखते बाहर-बाहर । क्या तुम वैसे ही हो अन्दर ॥ सर ढँक लें तो पैर उघड़ते छोटी पड़ी सदा ही चादर ॥ उनका घर उस पार क्षितिज के और बहुत छोटे अपने पर ॥ बहुत दूर आ गए नीड़ से अब तो बस अम्बर ही अम्बर ॥ उनकी किस छवि को सच मानें मुख में राम बगल में खंज़र ॥ सार... [पूरी पोस्ट]
writer joshi kavirai
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[10 May 2009 10:37 AM]

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