रेगिस्तान
न देखा हुआ सच , किनारे से किनारे तक , दूर तक फ़ैला हुआ । रेत की तरह , शुष्क । तपती धूप में जलता हुआ । किसे पता है यह सच , जो किसी को नही पता । मुझे पता है । मुझे मालूम है । दूर तक जाना है मुझे , इन प्रतिबिंबो पर पैर रखते हुए । क्या टिके रहेगे मेरे पां...
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चंदन कुमार झा
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[09 May 2009 18:50 PM]



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