हम क्या करें?
प्रतिलिपि के प्रतिभाशाली संपादक और संवेदनशील समकालीन कवि गिरिराज किराड़ू ने यह खबर अभी भेजी है। क्या अभी भी जानना-समझना बाकी है कि पूंजी, बाज़ार, तकनीक, राजनीति और मनुष्य-विरोधी हिकमत से गढे़-बनाए गये इस तथाकथित लोकतांत्रिक यथार्थ में असली सृजनात्मक प्...
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Uday Prakash
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[08 May 2009 08:21 AM]



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