ये मनाने का हुनर हो शायद ...
गूरू देव ने इसे छू लिया और ये कहने लायक बन पडी है आप सभी का आर्शीवाद भी चाहूँगा ... बहरे रमल मुसद्दस मखबून मुसक्कन ( २१२२ ११२२ २२ ) मेरा भी दिल-ओ- ज़िगर हो शायद । उसको भी इसकी ख़बर हो शायद ॥ रास्ते दे रहे आवाज़ मुझे । मेरी किस्मत में सफर हो शायद ॥ दूर...
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"अर्श"
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[07 May 2009 10:42 AM]



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