बीज व्यथा

अनहद नाद ज्ञानेन्द्रपति की एक कविता बीज व्यथा वे बीज जो बखारी में बन्द कुठलों में सहेजे हण्डियों में जुगोए दिनोंदिन सूखते देखते थे मेघ-स्वप्न चिलकती दुपहरिया में उठँगी देह की मुं‍दी आँखों से उनींदे गेह के अनमुँद गोखों से निकलकर खेतों में पीली तितलियों की तरह... [पूरी पोस्ट]
writer PRIYANKAR
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[07 May 2009 08:46 AM]

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