एक सपना पलक पर सजा तो सही
ज़िन्दगी को कभी आजमा तो सही; एक सपना पलक पर सजा तो सही। पाँव ऊँचाइयों के शिखर छू सकें, सोच को पंख अपने लगा तो सही। बाजुओं में सिमट आएगा यह गगन, कोई कोना पकड़ कर झुका तो सही। मोम पत्थर गला कर बनाती है वो, आग सीने में थोडी जला तो सही। कर न परवाह ऊँची लह...
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chandrabhan bhardwaj
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[06 May 2009 03:16 AM]



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