क़दमों में ख़म माँगा
तकता था , सिसकता था दुनिया ने कहाँ बाँधा ? जुबाँ को शब्द नहीं थे शब्दों ने है कुछ बाँचा अरमानों और हकीकत को कहाँ कहाँ जाँचा तेरी उँगली पकड़ने को तेरा ही साथ माँगा सर रख के जो ये रोता कब मिला कोई काँधा ऊँची- नीची डगर पर माली ने है कुछ राँधा सपनों में...
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शारदा अरोरा
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[06 May 2009 02:46 AM]



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