"मैं"
मैं " कलमों के टूटे ढेर थे मैं छेड़ता रहा, लफ्जों के हेर फेर ने समझा नहीं मुझे.... कच्ची थी सोंधी ख़ाक में मैं बोलता रहा , चाकों के एतबार ने चूप्का किया मुझे... लौहएमकान का का राज़ था क्यों फाश हो गया , कुत्बों के इन्तखाब ने रुसवा किया मुझे ... .. खार...
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seema gupta
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[05 May 2009 23:55 PM]



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