घर की तामीर चाहे जैसी हो, इसमें रोने की एक जगह रखना।
घर की तामीर चाहे जैसी हो, इसमें रोने की एक जगह रखना। निदा फाज़ली सच घर में एक कोना तो ऐसा होना चाहिये, जहाँ इंसान जी भर के रो सके। फूट फूट कर ज़ार ज़ार। जहाँ कोई ना हो। हम हों.... हमारे आँसू हों। हमें कोई चुप ना कराये बल्कि अंदर से कोई बार बार कहे, "...
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कंचन सिंह चौहान
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[05 May 2009 03:01 AM]



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