मैं मर भी न पाऊँगा अब ज़हर खाके...
मैं गाता हूँ जब मूड अपना बना के, गधे रेंकते हैं मेरे घर में आ के, मेरी नौकरी जब से छूटी है तब से, निकलते हैं सब यार बटुआ छुपा के, हुई बंद बनिये की भी अब उधारी, मैं मर भी न पाऊँगा अब ज़हर खाके, मैं कड़का सही तुम मेरे घर तो आओ, खिलाऊँगा तुमको मैं मुर्ग...
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ऋतेश त्रिपाठी
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[05 May 2009 01:03 AM]



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