आज का एक सच

तलाश छोटी सी तनख़्वाह में ............ वक्त की सुईयों ने सबकी जुबान सील दी है। बेटी अपने फटे हुए बस्तें को छिपाते हुए रोज स्कूल जाया करती है। बूढे पिता चंद पैसे बचाने की ख़ातिर कड़ी धूप में इकलौता छन्ना हुआ रुमाल सिर पर रखकर डी.टी.सी बस का इंतजार करते मिलते... [पूरी पोस्ट]
writer सुशील कुमार छौक्कर
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[05 May 2009 00:57 AM]

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