मैं एक अनवरत गुस्सा हूं

मीमांसिकी मैं एक अनवरत गुस्सा हूं अपने समय की कविता के खिलाफ उबलता हुआ एक औजार जो समझौता परस्त चालाक और दुनियादार हाथों का रूमाल बनने से इनकार कर देता है। मैं अपने समय की सुचिक्कणता में अंटने से इनकार करता हूं अपने प्यारे प्यारे चूजों के चोंच में दाना डालते हु... [पूरी पोस्ट]
writer कपिलदेव
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[04 May 2009 15:29 PM]

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