खबरी की एक गज़ल
हुनर भी सब चुक गया है, मुस्कुराने का अब जमाना लद गया है- दिल लगाने का छांव, बारिश, नीम, नदिया- सब पुरानी हो गयी जबसे चलन चला है- मेहमानखाने का फोन वाले प्यार की तासीर कम होती रही कब से वाकया नहीं हुआ- सपनों में आने का होली, दीवाली, ईद- सब दरिया में ज...
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देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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[04 May 2009 15:25 PM]



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