जोशी कविराय - Joshi Kavirai
लूट-मार, चोरी-डाका कुछ हुआ नहीं । फिर भी मेरे घर में कुछ भी बचा नहीं ॥ अपने दुःख की चीख-पुकारें करते सब किंतु पराया दर्द किसीने सुना नहीं ॥ फलवाली शाखाएं झुक-झुक जाती हैं बिन फलवाला पेड़ ज़रा भी झुका नहीं ॥ उन आमों में मीठा रस कैसे होगा कभी जिन्होंने...
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joshi kavirai
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[04 May 2009 13:26 PM]



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