लोक सभा टीवी पर मेरी कविता

अपना घर लिखने से कुछ बदलेगा क्या बहुत पहले से लिखती रही । लिख लिख के भूलती रही। लेकिन छपने का सिलसिला बहुत देर से शुरू हुआ। न जाने कितनी कविताएँ इधर उधर बिखरी पड़ी हैं। कुछ बदल तो रहा नहीं है। कुछ डायरियाँ मायके के घर में रह गईं। बाद में उन्हें जाकर ले आई। क... [पूरी पोस्ट]
writer आभा
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[04 May 2009 04:18 AM]

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